शुक्रवार, १६ ऑगस्ट, २०१९

मंगलवेढ़ा का इतिहास/ Mangalvedha ka Itihas

Vishnu, Mangalwedha, Sculptures.
संभवतः भगवान विष्णु की प्रतिमा

मंगलवेढ़ा नामक एक प्रमुख तीर्थस्थल पंढरपुर से 21 किमी की दूरी पर है. इस स्थान के नाम की उत्त्पति से संबंधित दो विचार प्रवाह जुड़े हुए हैं. पहले विचार प्रवाह के अनुसार यहाँ राज्य करने वाले ‘मंगल’ नामक राजा के कारण यह नाम पड़ा तथा दूसरे के अनुसार गाँव में स्थित ‘मंगलाई’ माता के कारण इसे ‘मंगलवेढ़ा’ नाम प्राप्त हुआ. यहाँ पर मिलनेवाले पुरावशेष 9-11वीं शताब्दी के भी पीछे तक ले जाते हैं. 



चालुक्य, कलचुरी राजवंशों के समय यह एक प्रमुख स्थान था. कुछ समय तक यह प्रदेश देवगिरि के यादवों के अधिपत्य में भी रहा. अंततः लगभग 14वीं शताब्दी में यह बहमनी राज्य का अंग बना रहा. मंगलवेढ़ा में जगह-जगह प्राचीन पुरावशेष बिखरे पड़े हैं. 
इनमें भगवान विष्णु, ब्रह्मा, नागदेवता, जैन प्रतिमाएँ, ऋषि प्रतिमा, विभिन्न मंदिरों के स्तंभ, गढ़ी, मंदिर, बारव आदि शिल्प एवं स्थापत्य रचना प्रमुख हैं.
Mangalwedha, Solapur, Temples, Sculptures.
ब्रह्मा, काशी विश्वेश्वर मंदिर के पास
Jain Tirthankar, Mangalwedha, Solapur.
जैन तीर्थंकर
मंगलवेढ़ा में महाराष्ट्र के महान संत चोखामेला का मंदिर है. वे पंढरपुर के विट्ठल जी के परमभक्त थे तथा संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे. चोखामेला ने भक्ति मार्ग के साथ-साथ समाजोद्धार का भी महान कार्य किया. सन 1338 में एक किलेनुमा भवन के निर्माण कार्य में दीवार के धँस जाने के हादसे में उनका दुखद निधन हुआ. इस हादसे में अन्य लोगों को भी अपने प्राण गँवाने पड़े. यह समाचार सुनकर संत नामदेव जी तत्काल मंगलवेढ़ा आये तथा चोखामेला की अस्थियों को पंढरपुर ले गए, बाद में चोखामेला की समाधि बनवाई गई.
मंगलवेढ़ा में ही 13वीं शताब्दी में संत कवयित्री कान्होपात्रा का जन्म हुआ था. वह पंढरपुर के भगवान विट्ठल जी को पूजती थीं. उन्होंने अनेक अभंगों की रचना की थी. उनके अभंग चरित्र महिपतिकृत ‘भक्त-विजय’ नामक ग्रन्थ में आये हैं. स्थानीय कथानुसार जब समाज विघातक लोगों द्वारा उनसे छल किया जाने लगा था तब वह हमेशा के लिए पंढरपुर आकर विट्ठल जी की भक्ति करने लगीं.
धर्म एवं मानवता के लिए अपना जीवन अर्पण करनेवाले संत दामाजी भी मंगलवेढ़ा के निवासी थे. वे बीदर की सल्तनत में भू-राजस्व अधिकारी थे. वे अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुये विट्ठल जी की भक्ति भी किया करते थे. सन 1458-60 में महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा था. भुखमरी से सैकड़ों लोगों की जाने जा रही थीं. परन्तु सरकारी गोदाम अनाज़ों से भरे पड़े थे. भू-राजस्व अधिकारी के नाते उन्होंने सुलतान की आज्ञा के बिना ही गोदाम आम लोगों के लिए खोल दिए. उनकी इस अवज्ञा से क्रोधित होकर बहमनी सुलतान हुमायूँ ने उन्हें कैद करके अपने सामने हाज़िर करने का हुक्म दिया. कहा जाता है कि दामाजी के बीदर पहुँचने के पहले ही विट्ठल भगवान ने एक हरिजन के वेश में बीदर दरबार में आकर बाँटे गए अनाज का मूल्य चुकता किया. दामाजी ने अस्पृश्यता निवारण का कार्य भी किया. हर वर्ष पौष महीने में मंगलवेढ़ा में उनके स्मरणार्थ यात्रा का आयोजन किया जाता है.
Mangalwedha, Barav, Water tank, Solapur.
बारव, काशी विश्वेश्वर मंदिर
Mangalwedha.
बुर्ज के अवशेष, मंगलवेढ़ा
इसी नगर में लगभग 800 वर्ष पुराना 'काशी विश्वेश्वर महादेव’ मंदिर भी है. 1572 इसवीं में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था. यहाँ महाशिवरात्रि का उत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
Mangalwedha, Solapur, Temple.
काशी-विश्वेश्वर मंदिर का सामान्य दृश्य
यहाँ की ‘चौबुर्जी’ नामक वास्तु प्रसिद्ध है. यहाँ पीर गैबी बाबा की दरगाह भी है, जहाँ हर वर्ष ‘उर्स’ का आयोजन किया जाता है.
Gaibi Pir, Mangalwedha.
गैबी पीर की दरगाह
पंढरपुर, सोलापुर से सरकारी बस-सुविधा उपलब्ध है. नजदीकी रेल-स्टेशन पंढरपुर में है. सोलापुर रेल-स्टेशन भी यात्रियों के लिए सुविधाजनक हैं. (पंढरपुर-26 किमी, सोलापुर-54 किमी, विजयपुरा-87 किमी, कराड- 171 किमी)


शनिवार, १० ऑगस्ट, २०१९

शिखर-शिंगणापुर के शंभू महादेव/ Shikhar-Shinganapur ke Shambhu Mahadev


महाराष्ट्र की महादेव पहाड़ियों के एक विशाल शिखर पर महादेव का प्राचीन मंदिर है. यह धार्मिक स्थल सतारा जिले के 'माण' नामक तहसील में स्थित है. माना जाता है कि चैत अष्टमी के दिन शिव-पार्वती का विवाह इसी स्थान पर संपन्न हुआ था. इस आधार पर ग्रामवासी हरसाल इसी दिन शिव-पार्वती के विवाह का आयोजन करते हैं.

शंभू महादेव के मंदिर का सामान्य दृश्य

शंभू महादेव मंदिर पर अंकित शिल्प
ज्ञात इतिहास से पता चलता है कि यादव राजा ‘सिंघण’ ने इस मंदिर का निर्माण किया था. आज का शिंगणापुर उस समय का ‘सिंघणपुर’ बताया जाता है. यहाँ की पहाड़ी पर स्थित शम्भू महादेव के विशाल मंदिर में पहुँचने के लिए लगभग 180 मी ऊँची चढ़ाई करनी पड़ती है. मार्ग में ‘खडकेश्वर’ और ‘मांगोबा’ मंदिर के दर्शन पाकर शिवाजी महाराज की प्रेरणा से बने महाद्वार तक हम पहुँच जाते हैं. मुख्य मंदिर में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम दीपमालाएँ नज़र आती हैं. मंदिर गर्भगृह, अंतराल, सभामंड़प तथा नंदीमंडप से युक्त है. वर्तमान में स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से लगभग १७-१८वीं सदी में बनाया हुआ प्रतीत होता है. यहाँ शिव-पार्वती के स्वयंभू लिंग हैं. 

शंभू महादेव मंदिर के स्तंभ पर श्री कृष्ण जी का शिल्प
मंदिर तथा स्तंभों पर तरह-तरह के शिल्प बनाये गए हैं. इस पर पशुपति, विष्णु, कृष्ण, गणेश तथा अन्य शिल्प भी दिखाई देते हैं. जंगली सुअरों तथा अन्य शिकार के दृश्य बड़ी ही कलात्मकता से बनाए गए हैं. मंदिर के परिसर में अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं.

हिरण के शिकार का दृश्य
मुख्य मंदिर के पास ‘बलीराजा’ का मंदिर है. यह मंदिर मुख्य मंदिर की छोटी प्रतिकृति ही लगता है. स्थापत्य एवं कला कि दृष्टि से यह मंदिर १२-१३वीं सदी का प्रतीत होता है. मंदिर अभी भी सुअवस्था में है. यह भूमिज शैली में निर्मित मंदिर वास्तुकला का एक सुंदर नमूना है.
बली मंदिर, शिखर-शिंगनापुर
शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ भव्य मेले का आयोजन होता है. महाराष्ट्र के कोने-कोने से हजारों भक्तगण पूरी श्रद्धा एवं ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष करते हुए अपनी कावड़ियों के साथ आते हैं. 
शिंगणापुर के लिए पुणे, सतारा, फलटण तथा म्हसवड से बसों की सुविधा है. प्राचीन काल से ही यह एक सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल रहा है. आस-पास का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक है. 

(फलटण- 36 किमी, बारामती- 50 किमी, पंढरपुर- 83 किमी, सतारा- 85 किमी, दौंड- 94 किमी, जेजुरी- 99 किमी, कोल्हापुर- 160 किमी, पुणे- 151 किमी, तुलजापुर- 197 किमी)